भारत की 6 महिला स्वतंत्रता सेनानी




राष्ट्र निर्माण कार्य एक पुनीत कार्य है। राष्ट्र के हित में जो भी कार्य किया जाए कम है। राष्ट्र के लिए बलिदान होने वाले वीरों की गौरव गाथाओं से इतिहास के पृष्ठ रंगे हुए हैं। राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत नारियों के बलिदान की गौरव गाथाएँ हमारे देश के इतिहास को गौरवान्वित करती हैं। स्वतंत्रता संग्राम में स्त्रियाँ परदे से निकल कर, घर की चारदीवारी को छोड़कर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ीं। पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। ऐसी वीरांगनाओं की एक लंबी सूची है। जिनमें से कुछ के विषय में हम बताने जा रहे हैं।

सरोजिनी नायडू-

13 फरवरी 1879 में हैदराबाद में जन्मी सरोजिनी की माता का नाम वरदासुंदरी तथा पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय था। इन्होंने काव्य लेखन की प्रतिभा अपने माता-पिता से विरासत में पाई थी। उनके मधुर स्वर के कारण उन्हें भारत कोकिला की उपाधि प्रदान की गई। इनका विवाह गोविंद राजुल नायडू के साथ हुआ। गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी के संपर्क में आने के बाद यह राष्ट्र प्रेम पर आधारित कविताएँ लिखने लगीं। इनके भाषण जोशीले होते थे। इन्होंने 1910 में क्रांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया। 1925 ई0 में यह भारतीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। 1930 में ‘नमक तोड़ो आंदोलन’ में इन्होंने दांडी मार्च किया। 1942 में गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन में भी इन्होंने भाग लिया। आजादी की लड़ाई में कई बार जेल भी गईं। यह स्वतंत्र भारत में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल बनीं। 2 मार्च 1949 को इनकी मृत्यु हुई।

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बेगम हजरत महल-

बेगम हजरत महल अवध के नवाब वाजिद अली शाह की पत्नी थीं। डलहौजी ने 1856 में नवाब पर कुशासन और अकर्मण्यता का आरोप लगाकर उन्हें नजर बंद कर लिया और अवध पर कब्जा कर लिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के विद्रोह की शुरूआत हो चुकी थी। बेगम हजरत महल ने लखनऊ और आस-पास के सामंतों को एकत्र कर अंग्रेजों से लोहा लिया। इन लोगों ने अवध के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में लखनऊ छोड़ अन्य सभी क्षेत्रों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। नवाब वाजिद अली के उत्तराधिकारी के रूप में उनके अवयस्क पुत्र बिरजीस को अवध का नवाब घोषित कर उसकी संरक्षिका बन गईं। लेकिन मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के कैद होते ही क्रांतिकारी हिम्मत हार गए। अंग्रेजों ने एक बार फिर धीरे-धीरे सभी क्षेत्रों पर अपना कब्जा कर लिया। बेगम हजरत महल अपने पुत्र के साथ नेपाल चली गईं। और काठमांडू में रहने लगीं। सन 1874 में इनकी मृत्यु हो गई।

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रानी गिडालू या रानी गायदिन्ल्यू-

26 जनवरी सन 1915 में मणिपुर के रांगमई नामक गाँव में इनका जन्म हुआ। इन्हें ‘नागालैंड की रानी लक्ष्मी बाई’ भी कहा जाता है। 13 वर्ष की छोटी सी आयु में अपने चचेरे भाई जादोनागा के साथ जुड़ीं। जादोनागा मणिपुर से अंग्रेजों को हटाना चाहते थे। इन्होंने ‘हेराका’ नामक आंदोलन चला रखा था। लेकिन इससे पहले कि आंदोलन सफल होता, जादोनागा को बंदी बना फाँसी की सजा दे दी गई। अब आंदोलन की कमान गाइदिन्ल्यू ने संभाल ली। वह छापामार युद्ध और शस्त्र चलाने में माहिर थीं। इनके साथ चार हजार नागा सैनिक थे। अंग्रेजों की नजर में यह एक खूँखार नेता थीं। 16 वर्ष की आयु में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। नेहरू जी के अनेक प्रयास के बाद भी इन्हें रिहाई नहीं मिली। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद यह रिहा हुईं। तत्पश्चात इन्होंने नागा लोगों के उत्थान और विकास कार्य संभाल लिया। इन्हें ‘ताम्रपत्र स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार’, ‘पद्मभूषण‘ और विवेकानंद सेवा पुरस्कार मिला। 78 वर्ष की आयु में 17 फरवरी 1983 को इनका निधन हो गया।

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रानी लक्ष्मीबाई-

19 नवंबर 1928 को वाराणसी में जन्मी लक्ष्मी बाई मोरोपंत तांबे और भागीरथी सोपरे की पुत्री थीं। इनका नाम मणिकर्णिका तांबे था। प्यार से लोग इन्हें मनु और छबीली भी कहते थे। इनका विवाह झांसी नरेश गंगाधर राव नेवालकर के साथ हुआ। विवाह के पश्चात इनका नाम लक्ष्मी बाई पड़ा। 21 नवंबर 1953 को गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व उन्होंने दामोदर राव को गोद लिया। अंग्रेज दामोदर को झांसी का उत्तराधिकारी नहीं मानते थे। उन्होंने झांसी के किले पर कब्जा कर लिया। झांसी की रक्षा के लिए लक्ष्मी बाई ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। आठ दिन तक युद्ध हुआ। अपने ही एक सरदार की गद्दारी के कारण उन्हें किला छोड़ना पड़ा। कालपी के निकट अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। घायल रानी लड़ती रही। अंग्रेज रानी से हार कर पीछे हट गए। लेकिन अत्यधिक घायल होने के कारण रानी वीरगति को प्राप्त हुई।

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झलकारी बाई-

झांसी के भोजला गाँव के सदोवर सिंह और जमुना देवी के यहाँ 22 नवंबर 1830 को इनका जन्म हुआ। यह कोली जाति की थीं। बचपन में इनकी माँ मर गईं। पिता ने इन्हें लड़कों की तरह पाला। इनकी वीरता से प्रसन्न होकर गाँव वालों ने इनका विवाह झांसी के सेना नायक पूरन कोरी से कर दिया। यह लक्ष्मी बाई की हमशक्ल थीं। इनकी बुद्धिमत्ता और कार्यक्षमता से प्रभावित होकर लक्ष्मी बाई ने इन्हें शस्त्र संचालन और घुड़सवारी का प्रशिक्षण दिलवाया। रानी को झांसी के किले से सुरक्षित बाहर निकालने के लिए झलकारी बाई ने युद्ध में रानी का स्थान ले लिया। रानी की हमशक्ल होने के कारण वह अंग्रेजों को भ्रम में रखने में सक्षम थीं। इस युद्ध में इनके पति मारे गए। ऐसा कहा जाता है कि झलकारी बाई बच गई और रानी की मौत का बदला लेने लक्ष्मी बाई का वेश धारण कर ह्यूग रोज को मारने पहुँचीं। जहाँ बंदी बना ली गईं। सजा के रूप में इन्होंने फाँसी माँगी पर इनकी वीरता से प्रभावित ह्यूग रोज ने इन्हें रिहा कर दिया। कुछ इतिहासकार कहते हैं उस युद्ध में यह भी वीरगति को प्राप्त हुईं।

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लक्ष्मी सहगल-

24 अक्टूबर 1914 में जन्मीं लक्ष्मी सहगल एक परंपरावादी तमिल परिवार की थीं। मद्रास मेडिकल कालेज से मेडिकल करने के बाद ये सिंगापुर गईं। वहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के समय आजाद हिंद फौज से जुड़ गईं। अपने बाल काल से ही यह स्वतंत्रता आंदोलनों से प्रभावित थीं। यह एक डॉक्टर के रूप में सिंगापुर गईं थीं। 1943 में यह आजाद हिंद फौज की पहली महिला सदस्य बनीं और फौज की ‘रानी झांसी रेजीमेंट‘ की कर्नल बनीं। लेकिन लोग इन्हें कैप्टन लक्ष्मी सहगल के रूप में जानते हैं। इनका विवाह प्रेम सहगल से हुआ। यह भारत-पाकिस्तान के विभाजन को स्वीकार नहीं कर पाईं। इन्हें 1998 में ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया। 23 जुलाई 2012 को इनका निधन हुआ।

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